क्या ट्रम्प के इलाज में इस्तेमाल किया गया एंटीबॉडी कॉकटेल भारत की कोविड लड़ाई में ‘गेम चेंजर’ हो सकता है?

क्या ट्रम्प के इलाज में इस्तेमाल किया गया एंटीबॉडी कॉकटेल भारत की कोविड लड़ाई में ‘गेम चेंजर’ हो सकता है?

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। हरियाणा के 84 वर्षीय मोहब्बत सिंह को एंटीबॉडी कॉकटेल दिया गया जो पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को भी दिया गया था। मोहब्बत सिंह देश के पहले मरीज है जिन्हें रोश इंडिया और सिप्ला की एंटीबॉडी कॉकटेल ड्रग दी गयी। कॉकटेल देने के बाद सिंह को निगरानी में रखा गया और फिर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कॉकटेल को कोविड के खिलाफ लड़ाई में गेम चेंजर बताया जा रहा है। अध्ययनों से पता चला है कि यह ड्रग लेने वाले 80% रोगियों को अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

सबसे फेमस उदाहरण डोनाल्ड ट्रम्प का है जो पिछले साल कोरोना से संक्रमित हो गए थे। एक हफ्ते भीतर ही वह काम पर लौट आए थे। हालांकि मोनोक्लोनल एंटीबॉडी ड्रग का ये कॉकटेल काफी महंगा है। सिप्ला अस्पतालों में 59,000 रुपये प्रति खुराक की अनुमानित कीमत पर ड्रग की मार्केटिंग कर रही है। मरीज को ठीक होने के लिए इस कॉकटेल की केवल एक खुराक की जरूरत है। एएनआई को दिए एक इंटरव्यू में, मेदांता अस्पताल के डॉ. अरविंदर एस सोइन ने कहा कि भारत में उचित मूल्य पर मोनोक्लोनल एंटीबॉडी ड्रग का उत्पादन देश के लिए गेम चेंजर हो सकता है।

डॉ. अरविंदर एस सोइन ने बताया कि यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) की अधिकृत तीन स्पेसफिक ड्रग (मोनोक्लोनल एंटीबॉडी ड्रग) और भारत के सेंट्रल ड्रग स्टेन्डर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (सीडीएससीओ) की अधिकृत ड्रग ‘कोविड संक्रमण को जड़ से खत्म’ कर सकती है। डॉ सोइन ने कहा कि रोगी के पॉजिटिव टेस्ट के तुरंत बाद और निश्चित रूप से संक्रमण के पहले सप्ताह में दवा दी जानी चाहिए। इससे गंभीर बीमारी और मौतों को रोका जा सकता है।

आईसीएमआर के पूर्व महानिदेशक डॉ. निर्मल के गांगुली ने कहा, ‘चूंकि यह (मोनोक्लोनल एंटीबॉडी) एक अत्यधिक महंगा प्रोडक्ट है, इसे सभी कोविड-संक्रमित व्यक्तियों के लिए उपयोग न करें। इसका उपयोग केवल गंभीर संक्रमण वाले लोगों के लिए करें, जो अस्पताल में भर्ती हैं। आईसीएमआर के पूर्व प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. रमन आर गंगाखेडकर ने कहा, अगले कुछ दिनों में, हमें पता चल जाएगा कि मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कोविड और इसके वेरिएंट के खिलाफ कैसे काम कर रहे हैं।

डॉ गांगुली ने एएनआई को बताया कि मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी की लागत को कम किया जा सकता है यदि इसके निर्माण के लिए एक बहुत ही कुशल प्रणाली विकसित की जाती है। आईसीएमआर के पूर्व डीजी ने कहा, आजकल मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का उत्पादन स्तनधारी सेल कल्चर सिस्टम के माध्यम से किया जाता है और फरमनटेशन टेक्नोलॉजी के माध्यम से बड़ी मात्रा में इसका उत्पादन किया जा सकता है।

थेरेपी दो मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का एक कॉकटेल है। एंटीबॉडी प्रोटीन होते हैं जो शरीर किसी भी बीमारी से बचाव के लिए उत्पन्न करता है। मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कृत्रिम रूप से एक प्रयोगशाला में बनाई जाती हैं। किसी भी बिमारी से लड़ने के हिसाब से इसे तैयार किया जाता है। किसी भी कोविड रोगी में सामान्य एंटीबॉडी संक्रमण के 14 दिनों के बाद ही विकसित होते हैं। लेकिन इस ड्रग में लैब-निर्मित एंटीबॉडी तुरंत काम करते हैं।

कासिरिविमैब और इमडेविमैब को खास तौर पर कोविड महामारी फैलाने वाले वायरस SARS-CoV-2 के स्पाइक प्रोटीन के खिलाफ कार्य करने के लिए तैयार किया गया है। ये वायरस के अटैचमेंट और उसके बाद मानव कोशिकाओं में प्रवेश को ब्लॉक कर देती है। इस कॉकटेल में दोनो एंटीबॉडीज की 600-600 mg की खुराक दी जाती है। इसे 2-8 डिग्री सेल्सियस तापमान पर स्टोर किया जा सकता है।